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'हिंदी भाषा और साहित्य के लिए समर्पित पुरुषोत्तम दास टण्डन'

- डॉ0 कृष्ण गोपाल कपूर (अनुसंधान सहायक)
सूचना एवं भाषा प्रौद्योगिकी विभाग

भारतरत्‍न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन भारतीय संस्कृति के वे सुगन्धित पुष्य हैं जिनके सानिध्य में गंध और मकरंद दोनों का समावेश था। वे दृढ़ता, संयम, आत्म विश्वास, सिद्धांतवादी जीवन और राष्ट्रीयता की अद्भुत मिसाल थे। स्वदेश, स्वभाव, स्वधर्म, स्व संस्कृति के प्रति निष्ठा, आदर्श के लिए कुर्बानी और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। जात्याभिमान, राष्ट्रीयता, स्वदेशीपन और सहृदयता के आलोकिक प्रतिमान थे। टण्डन जी राजनीति में तो थे परन्तु राजतंत्र में हँकने वाले राजनेता नहीं थे। वे वकालत करते थे परन्तु तिकड़म प्रपंच और मूल्यहीनता ओड़ने वाले कानून वेता नहीं थे। वे संविधान की मूलभूत मीमांस के पारखी तो थे। लेकिन पदेन संविधान की परिधि में बंधे बंधुआ नहीं थे। वे किसान आन्दोलन के जनक रहे किन्तु कृषक क्षत्रप के प्रपंच से वंचित रहे। अंग्रेजी सरकार और उनकी संस्कृति के विरोधी थे परन्तु अंग्रेजियत की शत्रुता एवं कटुता से मुक्त रहे। मूलतः वे सन्त, स्वतंत्रताप्रेमी, स्थिर चित्त के प्रज्ञामयी साधक और हिन्दी भाषा के अमर सैनानी थे। वे इस युग के दधीची, राष्ट्रीय कांग्रेस को व्यक्ति एवं व्यक्तित्व के सत्य बोध का शोध कराने वाले प्रज्ञाशील जागरूक विचारक थे।
बचपन में ही अंग्रेज़ विद्यार्थियों ने भारतीयों की खिल्ली उड़ाई उनका जम कर प्रतिकार किया। भारतीय पोशाक के खिलाफ मि. 'हाडन्डेन' के दण्ड को स्वीकार किया लेकिन राष्ट्रीय भावना से समझौता नहीं किया।
पुरुषोत्तम दास टण्डन ने न किसी के साथ अन्यय किया न अन्याय सहन किया। चीनी खाना छोड़ना विदेशी वस्तुओं के प्रति प्रतिकार, जूता पहनना छोड़ा-गाय के चमड़े का इस्तमाल, चलती हुई वकालत पर लात मारकर देश तथा समाज के लिए 'सन्यास' का कृत ले लिया। दीवान, राम साहब, मलिक आदि चाटुकारिता भरी उपाधि को तिरस्कृत कर दिया। भारत विभाजन का विरोध किया तो आजादी के जश्न कार्यक्रमों में कदम भी न रख कर दृढ़ता तथा पूर्ण निष्ठा का पालन किया।
वे संविधान में हिंदी भाषा को सम्मान जनक स्थान दिलाने के लिए प्रयत्नशील रहे। हिंदी और 'हिंदुस्तानी' के बीच कोई प्रतिस्पर्धा न मान कर, हिंदी तथा देवनागरी के लिए उन्होंने सदैव प्रयत्न किया। उनके ही सद्प्रयत्नों से हिंदी को समाज, राजभाषा रूप में और लोगों के दिल में सम्मान मिला।
हिंदी के समग्र विकास, सम्मान और स्वीकार्य के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। राष्ट्र के प्रति निष्ठा, स्वदेशी भावना के प्रति समर्पण कारी सिंह गर्जना, खादी को जीवन का अंग बनाना आदर्शवादी चिंतन, राष्ट्र के लिए वैयक्तिक कार्यो का उत्सर्ग, राष्ट्र के लिए होम करने वाली तेजस्विता, सिद्धान्तवादी जीवनदृष्टि, राष्ट्रीय जीवन के लिए समर्पण, तिल-तिल जल कर राष्ट्रमाता के मंदिर के लिए स्वंय का अर्घ चढ़ा कर पूर्ण हूति देना, यह उन जैसे निष्ठावान महर्षि को ही समर्पित था।
आज हम मूल्यों के तिरोहन में उनके द्वारा दर्शाये मार्ग का अनुसरण करें यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजली होगी।

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