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संगोष्ठी एवं कार्यगोष्ठी
"लघु पत्रिकाएँ विकल्पों की संवाहक हैं। लघु पत्रिकाओं को सामाजिक-आर्थिक विषमताओं का वैज्ञानिक ढंग से सामना करना होगा।" यह बात केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, द्वारा आगरा में लघु पत्रिकाओं पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के अध्यक्षीय वक्तव्य में संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.रामशरण जोशी ने कही। यह आयोजन संस्थान के नजीर सभागार में संपन्न हुआ। संगोष्ठी में दिल्ली, पंजाब, उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल के पचास से अधिक संपादक-लेखकों ने सहभागिता की। इनमें हिंदी के अलावा पंजाबी लेखक भी शामिल हुए। संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन ने कहा कि टेलीविजन और बड़े सूचना घरानों के बावजूद लघु पत्रिकाएँ अपनी विशिष्टता के कारण जानी जाती हैं। केन्द्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक और उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष प्रो.शंभुनाथ ने कहा, लघु पत्रिका लिटिल मीडिया है। यह संस्कृति उद्योगों द्वारा लगातार हाशिए पर ढकेली जा रही कलाओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं की जु़बान है। संस्थान द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का फोकस 'भाषाई साम्राज्यवाद की चुनौतियाँ और लघु पत्रिकाएँ' विषय पर था। कथाकार रमेश उपाध्याय ने अपना आलेख पढ़ते हुए कहा कि यह साम्राज्यवाद का ही असर है कि चारों तरफ अँग्रेजी राज कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषाई साम्राज्यवाद का विरोध अंग्रेजी का विरोध नहीं है। साहित्यिक पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विभूतिनारायण राय का कहना था कि भूमंडलीकरण और बाजारवाद से निराश होने और इन पर विलाप करने से कुछ नहीं होगा। विषम स्थितियों में ही श्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है। हेतु भारद्वाज ने कहा कि लघु पत्रिकाएँ बड़े लक्ष्य लेकर काम करती हैं। गोपाल राय ने लघु पत्रिकाओं के लिए एक वेबसाइट की जरूरत बताई। इस सत्र के अध्यक्ष कवि राजेश जोशी का कहना था कि उपभोक्तावाद विचार-शून्यता फैला रहा है। लघु पत्रिकाएँ एक जुट होकर इस चुनौती का जवाब दे सकती हैं। इस सत्र में भारत भारद्वाज, गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, अजेय कुमार, रवि शंकर रवि, योगेन्द्र कुमार, ज्योत्स्ना रघुवंशी, वीना शर्मा ने चर्चा में हिस्सा लिया। समापन सत्र में अजय तिवारी ने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि लघु पत्रिकाएँ वृहद मीडिया के विकल्प के रूप में एक आन्दोलन है। प्रफुल्ल कोलख्यान का कहना था कि लघु पत्रिका आन्दोलन में प्रतिद्वंद्विता की नहीं सहकारिता की जरूरत है। शिवराम ने कहा कि आज विमर्श निष्कर्ष प्रदान नहीं करते। हमारे भीतर एन.जी.ओ.-वाद घुस गया है। सत्रोपरांत प्रश्न-चर्चा में रामकुमार कृषक, जयप्रकाश धूमकेतु, राजेन्द्र शर्मा, इन्दु सिंह, प्रो.रामवीर सिंह, दिवाकर भट्ट, रमेश रावत आदि के अलावा केन्द्रीय हिंदी संस्थान के देशी-विदेशी विद्यार्थियों ने उत्साह से भाग लिया। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन महेश जायसवाल द्वारा एक जनगीत के गायन और कुलसचिव चंद्रकांत त्रिपाठी के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। ![]()
केन्द्रीय हिंदी संस्थान 1857 की उत्तरसदी स्वर्ण जयंती के अवसर पर कोलकाता मुंबई और हैदराबाद में राष्ट्रीय संगोष्ठियों के सफल आयोजन के बाद इस कड़ी की चौथी और अंतिम संगोष्ठी दिनांक 8-10 मई 2007 को एन.सी.पी.यू.एल के सह-संयोजकत्व में साहित्य अकादेमी सभागार, नई दिल्ली में करने जा रहा है। इस संगोष्ठी का उद्घाटन करेंगे माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री क्षी अर्जुन सिंह। विषय प्रवर्तन करेंगे वरिष्ठ आलोचक एवं संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ। गौरतलब है कि इन राष्ट्रीय संगोष्ठियों के माध्यम से देश भर के हिंदी विद्वान, हिंदीतर भारतीय भाषाओं के विद्वानों और लेखकों के साथ पहली बार व्यापक सांस्कृतिक संवाद कर रहे हैं। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय है '1857, नव जागरण एवं उत्तर भारतीय भाषाएँ।' संगोष्ठी में भारतीय भाषाओं के समक्ष 21वीं सदी की चुनौती पर भी चर्चा होगी। संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ संगोष्ठी की चर्चा के बिंदुओं का खुलासा करते हुए कहा कि इस संगोष्ठी के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि में सभी उत्तर भारतीय भाषाओं की स्वातंत्र्य-मुखरता और सामाजिक संचेतना से जुड़े अस्मिता बोध के विविध फलक उभर कर सामने आएंगे। किस तरह 1857 का असर उत्तर भारत की भाषाओं और बोलियों की नई पहचान और नये तेवर तय करता है? - यह अपने-आप में महत्वपूर्ण तथ्य है, जिसे इस संगोष्ठी के माध्यम से स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया जा सकेगा। संगोष्ठी में हिंदी-उर्दू के अलावा कश्मीरी, डोगरी, पंजाबी और सिंधी भाषाओं के विद्वान भी भाग लेंगे। इस दृष्टि से यह राष्ट्रीय संगोष्ठी इन भाषाओं के बीच सांस्कृतिक सेतु निर्माण का कार्य भी करेगी।
केन्द्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली केन्द्र द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के लेक्चर हाल में 'भारतीय प्रकाशन की समस्याएँ' विषय पर 9 अगस्त 06 को एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई। प्रथम सत्र का आधार-विषय था : 'हिंदी प्रकाशन उद्योगः समस्याएँ और संस्कृति'। द्वितीय सत्र में 'पुस्तकें: पाठकों की खोज में', विषय पर चर्चा हुई। इस संगोष्ठी में वरिष्ठ लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों ने सक्रिय भूमिका निभाई। उद्घाटन सत्र की विषय-प्रस्तुति संस्थान के निदेशक प्रो.शंभुनाथ ने की। संगोष्ठी की मूल संकल्पना को रेखांकित करते हुए प्रो.शंभुनाथ ने कहा कि जब तक लेखकों, पाठकों और प्रकाशकों का समन्वित त्रिभुज नहीं निर्मित होता और उनमें आपसी संवाद नहीं बढ़ता, तब तक देश में पुस्तक-चेतना की क्रान्ति नहीं आ सकती। संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो.रामशरण जोशी ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए कहा कि पुस्तकों ने समाज में लोकतांत्रिक संस्कारों को जगाया है। राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान, कोलकाता के निदेशक श्री के. के. बनर्जी ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज बन रही है और हम इंटरनेट के दरवाजे पर खड़े हैं। अब तो डिजिटल बुक्स का ज़माना आ गया है। ऐसे परिवेश में पुस्तक-प्रकाशन को उद्योग का दर्जा देने और राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने की बेहद जरूरत है। उद्घाटन सत्र में प्रतिष्ठत प्रकाशन नेशनल पब्लिशिंग हाउस के वयोवृद्ध संस्थापक श्री कन्हैयालाल मलिक को संस्थान के उपाध्यक्ष श्री रामशरण जोशी ने सम्मानित किया। संगोष्ठी के प्रथम सत्र (भारतीय प्रकाशन की समस्याएँ) की अध्यक्षता प्रो. शंभुनाथ ने की। वरिष्ठ प्रकाशक श्री अरुण माहेश्वरी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में प्रकाशन उद्योग के लिए परिस्थितियाँ पाश्चात्य जगत की भाँति सुविधाजनक और अनुकूल नहीं हैं फिर भी हमें निराश नहीं होना चाहिए। संगोष्ठी के द्वितीय एवं समापन सत्र (पुस्तकें- पाठकों की खोज में) की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार एवं विचारक प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी ने की। संगोष्ठी का संचालन संस्थान के प्रकाशन-प्रबंधक ङॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा ने किया।
"कविता में अर्थ होता नहीं है, कवि द्वारा दिया जाता है। जिस तरह एक पुरानी लोक कथा में राक्षस के प्राण तोते में बसते थे, उसी तरह कविता का अर्थ ढँढ़ना भी दुरूह पहेली है।" ये विचार हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष और महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति डा. नामवर सिंह, ने 1-2 सितम्बर, 06 को उदयपुर में आयोजित अखिल भारतीय कविता कार्यशाला के उद्घाटन व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। कार्यशाला का आयोजन मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा तथा शब्दम् शिकोहाबाद के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया था। समारोह के विशिष्ट अतिथि उ.प्र. हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष श्री सोम ठाकुर ने कहा कि नए युग की नई संवेदनशीलता कविता के लिए नय़ा मुहावरा गढ़ती है। इस अवसर पर केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के कुलसचिव डा. चंद्रकान्त त्रिपाठी ने कहा कि संस्थान का प्रयास है कि कविताओं की संगीतात्मक प्रस्तुतियों को बढ़ावा दिया जा सके। कार्यशाला के प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि विख्यात हिंदी कवि केदारनाथ सिंह तथा विशिष्ट अतिथि कवि वीरेन डंगबाल थे। इस सत्र में विनय सौरभ (झारखण्ड), शिव कुमार (जयपुर), राजीव सभरबाल (भोपाल), शशि मिश्रा (आगरा), माया त्रिपाठी (आगरा), पवन करण (ग्वालियर) आदि ने कविता पाठ किया। कार्यशाला के दूसरे दिन प्रथम सत्र में गोपाल सहर (गुजरात), सुभाष सिगाठिया (श्रीगंगा नगर), अम्बिका दत्त (कोटा), आशुतोष कुमार (अलीगढ़) तथा द्वितीय सत्र में आशीष त्रिपाठी (बाराणसी), प्रभात (जयपुर), गिरिराज किराडू (जोधपुर) आदि ने कविताओं का पाठ किया। दो दिन तक चले इस आयोजन के समापन समारोह में प्रो. केदारनाथ सिंह ने समापन व्याख्यान देते हुए कहा कि कार्यशाला मूलतः समाज विज्ञान से आया हुआ शब्द है। लेकिन कविता में कार्यशाला के आयाम बदल जाते हैं। सामूहिक साहचर्य से कविगण कविता-कौशल और काव्य-संवेदन के संबंधों को गहराई से समझ पाते हैं। कार्यशाला के अंत में सभागार के समीप उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा लगाई गई पुस्तक प्रदर्शनी का विद्यार्थियों तथा पाठक समुदाय ने लाभ प्राप्त किया। |